फेफड़ों के कैंसर (Lung cancer) का आयुर्वेदिक उपचार | Lung cancer ke shuruaati lakshan.

Lung cancer ke shuruaati lakshan और लंग कैंसर या फ़ेफ़डों के कैंसर का आयुर्वेदिक उपचार- (फ़ेफ़डों के कैंसर का अचूक इलाज) अगर बात की जाए फेफड़ों के कैंसर की, तो यह सबसे घातक कैंसर है।और सभी कैंसर्स का लगभग 15 - 20℅ हिस्सा है। यानी दुनिया भर में कैंसर के कारण होने वाली मृत्यु दर में 15 - 20% हिस्सा केवल लंग कैंसर का है।
फेफड़ों के कैंसर (Lung cancer) का आयुर्वेदिक उपचार | lung cancer ke shuruaati lakshan,lung cancer ka achuk ilaj
लंग कैंसर या फेफड़ों के कैंसर के अंदर हमारे फेफड़ों की कोशिकाएं असंयमित होकर वृध्दि करना शुरू कर देती है। और शरीर के अलग अलग हिस्सों में जाकर गांठ का निर्माण करने लग जाती है।
ज्यादातर फेंफड़ों का कैंसर धूम्रपान करने की वजह से होता है क्योंकि बीड़ी, सिगरेट, तम्बाखू आदि के धुंए में कार्सिनोजन (carcinogens) रसायन पाए जाता है जो लंग कैंसर का कारण होता है। हालांकि आजकल बहुत से मामले ऐसे भी देखने को मिलते हैं जिन में ऐसे लोगों को भी लंग कैंसर हुआ होता है जिन्होंने कभी धूम्रपान किया ही नही, उनमे इस कैंसर का कारण वायु प्रदूषण या परिवार के किसी सदस्य के धूम्रपान का सेवन करने की वजह से होता है।

फेफड़ों के कैंसर (Lung cancer) का आयुर्वेदिक उपचार | Lung cancer ke shuruaati lakshan.

लंग कैंसर या फेफड़ों के कैंसर के प्रकार -

लंग कैंसर दो प्रकार का होता है स्मॉल सेल लंग कैंसर और नॉन स्मॉल सेल लंग कैंसर (Small cell lung cancer and non small cell lung cancer) स्मॉल सेल लंग कैंसर नॉन स्मॉल सेल लंग कैंसर की तुलना में ज्यादा खतरनाक होता है, और लंग कैंसर के मरीजों में ज्यादातर (around 75 - 85℅) मरीज नॉन स्मॉल सेल लंग कैंसर के होते हैं। जो धीरे धीरे अपने अंतिम चरण तक पहुंच कर व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनता है। लंग कैंसर एक बहुत ही घातक बीमारी है जिसका पहले चरण में निदान होने के बावजूद भी अधिकतर लोगों की मृत्यु हो जाती है। फेफड़ों या लंग कैंसर के चार चरण या स्टेप होती है जिनसे होकर व्यक्ति गुजरता है और अंत मे बहुत से लोगों की मृत्यु हो जाती है।
आज के समय मे कीमोथेरेपी (chemotherapy) और कैंसर की गांठ को निकालने के लिए कई तरह की सर्जरी की जाती है जिनकी मदद से लंग कैंसर को ठीक किया जाता है, लेकिन यह तब ही संभव है जब कैंसर की स्टेज या चरण पहला या दूसरा हो, इसके बाद कैंसर का कोई इलाज नही है।
लंग कैंसर के उपचार के लिए आजकल एक नई पद्धति और काम ली जाती है जिसे साइंस की भाषा मे लक्षितथेरेपी (targeted therapy) के नाम से जाना जाता है, जिसे कीमोथेरेपी के साथ लागू किया जाता है, यह थेरेपी लक्षित यानी कैंसर सेल को लक्ष्य करके अपना काम करती है।

लंग कैंसर या फेफड़ों के कैंसर के चरण - Stage of lung cancer.

लंग कैंसर दो प्रकार का होता है स्मॉल सेल लंग कैंसर और नॉन स्मॉल सेल लंग कैंसर जिसमे नॉन स्मॉल सेल लंग कैंसर के चार चरण होते हैं, और स्मॉल सेल लंग कैंसर के दो चरण होते है जिनसे कैंसर की उम्र का पता लगाया जाता है और यह तय किया जाता है कि इसे ठीक किया जा सकता है या नही

नॉन स्मॉल सेल लंग कैंसर के स्टेज-

Stage 1 - यह चरण तब होता है जब कैंसर केवल फेफड़ों के अंदर पाया जाता है बाकी लसिका गांठ आदि सब सुरक्षित होते हैं।
Stage 2 - यह चरण तब होता है जब कैंसर फेंफड़ो सहित लसिका गांठो में पहुंच कर उन्हें प्रभावित करता है।
Stage 3 - इस स्टेज में कैंसर दोनो फेफड़ों और अपने आसपास के सभी अंगों को प्रभावित करने लग जाता है।
Stage 4 - चौथे चरण में कैंसर पूरे शरीर मे फैल जाता है जो कैंसर की लास्ट स्टेज होती है।

स्मॉल सेल लंग कैंसर के चरण -

इस प्रकार का लंग कैंसर को दो भागों में बंटा गया है -
व्यापक स्तर
सीमित स्तर
व्यापक स्तर में कैंसर पूरी बॉडी में व्याप्त होता है, और सीमित स्तर में कैंसर केवल एक फेंफड़े व लसिका गांठो तक सीमित होता है।

लंग कैंसर के लक्षण (Lung cancer ke shuruaati lakshan)

फेफड़ों के कैंसर के लक्षण टी.बी. (Tuberculosis) के लक्षणों के समान होते हैं। इसमे कई बार यह होता है, इसकी अच्छी तरह जांच ना कर पाने की स्थिति में चिकित्सकों द्वारा इसके लक्षणों के आधार पर टी.बी. का इलाज चला दिया जाता है, और जब अधिक समय तक कुछ फायदा नही मिलता फिर जांच कराई जाती है और उसमें लंग कैंसर पाया जाता है, लेकिन तब तक बहुत अधिक देर हो चुकी है और मरीज कैंसर के अंतिम चरण (last stage) में होता है। अतः चिकित्सकों को चहिए वे रोग की सटीक पहचान करें और फिर उसका इलाज दें।
लंग कैंसर की पहचान या उसे डायग्नोस करने के लिए बहुत सारी पद्धतियां उपलब्ध हैं लेकिन प्रभावित कोशिकाओं को निकालकर सूक्ष्मदर्शी द्वारा उनकी पहचान की जाती है जिससे की सटीक पता लगाया जा सकता है कि यह लंग कैंसर ही है इसे बायोप्सी (biopsy) के नाम से जाना जाता है।
श्वसन संबंधी परेशानी (respiratory problems) - फेंफड़े और इनके चारो तरफ मौजूद सभी अंगों में प्रभावित कैंसर कोशिकाओं के कारण सांस लेने में परेशानी खड़ी हो जाती है। इसके साथ ही खाँसी, खासी के खून आना, तेजी से सांस लेना, छाती में दर्द रहना, कैंसर अधिक होने की स्थिति में कंधे में तेज दर्द, पैरालाइसिस, खाना खाने में परेशानी होना, इन्फेक्शन की जगह पर गांठ का बन जाना इत्यादि।
इन सब के अलावा शरीर का कमजोर हो जाना, हमेशा थकान की स्थिति में रहना, हड्डियों में दर्द व उनका कमजोर हो जाना, कई बार कैंसर के कारण सिर में हमेशा दर्द का होना, दौरे आना, दिखाई कम देना जैसे बहुत से लक्षण दिखाई देते हैं।

फेफड़ों के कैंसर के कारण (fefadon ke cancer ke karn or ayurvedic ilaj)

धूम्रपान - 

फेफड़ों के कैंसर का मुख्य कारण धूम्रपान को ठहराया गया है, धूम्रपान करने वालों में सामान्य व्यक्ति की तुलना में फेफड़ों के कैंसर की बहुत अधिक आशंका होती है। अधिकतर मामलों मे कार्सिनोजन्स (carcinogens) को ही लंग कैंसर का कारण ठहराया जाता है, अधिकतर ये रसायन धूम्रपान यानी बीड़ी, तम्बाखू, सिगरेट आदि के इस्तेमाल से ही हमारे शरीर मे प्रवेश करते हैं, जो कि हमारे डी.एन.ऐ. को बहुत अधिक नुकसान पहुंचाते हैं, साथ ही लंग कैंसर के लिए जिम्मेदार होते हैं।
फेफड़ों के कैंसर के लिए और भी बहुत सारे कारक जिम्मेदार होते हैं जैसे कि -

पारिवारिक कारक - 

अगर किसी व्यक्ति के परिवार यानी उसका कोई निजी संबंधी धूम्रपान करता है तो धूम्रपान न करने वाले अन्य सदस्यों में भी लंग कैंसर की प्रतिरोधकता बहुत अधिक कम हो जाती है यानी लंग कैंसर के लिए अनुकूलता बढ़ जाती है।
साथ ही यदि परिवार किसी के पहले कैंसर हो चुका हो तो भी लंग कैंसर की संभावना रहती है।

लौ इम्युनिटी - 

प्रतिरक्षा कम होने की स्थिति में भी लंगकैंसर होने की संभावना रहती है, अंग प्रत्यारोपण (body part transplant) के समय दी जाने वाली प्रतिरक्षा अवरोधक दवाए आदि सभी लंग या फेफड़ों के कैंसर की संभावना रहती है।

एचआईवी एड्स - 

एचआईवी एड्स से पीड़ित लोगों में भी फेफड़ों के कैंसर की संभावना होती है।

रेडियोथेरेपी - 

किसी कारणवश करवाई गई रेडियोथेरेपी के फलस्वरूप भी लंग कैंसर की अनुकूलता अधिक हो जातीहै।

वायु प्रदूषण - 

आज के समय मे कल कारखानों और फैक्टरियों से निकली जहरीली गैस हमारे पर्यावरण को बहुत ही तेजी से प्रदुषित कर रही है, धूम्रपान के बाद लंग कैंसर का यह सबसे बड़ा कारण है।

फ़ेफ़डों का रोग - 

पहले फेफड़ो से संबंधित हुआ रोगभी फेफड़ों के कैंसर का कारण हो सकता है।

फेफड़ों के कैंसर (Lung cancer) का आयुर्वेदिक उपचार (fefdon ke cancer ka ayurvedic ilaj -

लंग कैंसर एक बहुत ही घातक बीमारी है जिसका सही समय और सटीक इलाज करवाना बेहद जरूरी होता है नही तो मरीज के जान का भी खतरा हो सकता है।
यहां हम आपको कुछ आयुर्वेदिक और घरेलू उपचार बता रहे हैं जो फेंफड़ों के कैंसर को खत्म करने में काफी मदद करेंगी। इनका प्रयोग आप लंग कैंसर की दवाओं के संयोजन में कर सकते हो, लेकिन एक बात का विशेष रूपसे ध्यान रखें कि इनका प्रयोग करने से पहले अपने चिकित्सक की सलाह जरूर लें। ताकि आप हर प्रकार से सुरक्षित रहें, बिना चिकित्सक की सलाह के इस तरह के इलाजों का प्रयोग बिल्कुल भी न करें।

गुग्गल धूप - 

फेफड़ों के कैंसर सहित गुग्गल धूप अन्य प्रकार के सभी कैंसर्स के लिए भी बहुत ही फायदेमंद होती है, यह एचआईवी एड्स जैसी खतरनाक बीमारी को भी मात दे सकती है। गुग्गल धूप को प्राचीन काल से ही एक चमत्कारिक औषधि के रूप में काम लिया जाता है। इसे प्रयोग में लाने से पहले इसे शुद्ध किया जाता है, शुद्ध करने के लिए गुग्गल धूप को गाय दूध में उबला जाता है, उबलने पर जो अवशेष बचता है उसे कूट कूट कर सुखाया जाता है और शुद्ध गुग्गल धूप तैयार की जाती है।
फेफड़े के कैंसर में उपचार के लिए इस शुद्ध धूप का प्रयोग गोमूत्र के साथ किया जाता है।
इसे प्रयोग में लेने के लिए सुबह और शाम का समय और खाली पेट बेहतर होता है। प्रयोग में लेने के लिए आधी चम्मच गुग्गल धूप को आधे कप गोमूत्र में मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह इसका प्रयोग रोजाना करते रहने पर लंग कैंसर के उपचार में मदद मिलती है।

मूंगफली - 

लंग कैंसर के लिए मूंगफली को भी एक बहुत ही अच्छा स्रोत माना जाता है। जो लंग कैंसर से लड़ने में काफी फायदेमंद होती है, लंग कैंसर के रोगी को अधिक से अधिक मूंगफलियों का सेवन करना चाहिए लेकिन इनका इस्तेमाल करने से पहले मूंगफली के दानों पर उपस्थित लाल आवरण को जरूर अलग कर दें, इस बात का विशेष ध्यान रखें।

समुद्री मझली - 

समुन्द्र में पायी जाने वाली छोटी बड़ी मछलियां फ़ेफ़डों के कैंसर के लिए काफी फायदेमंद होती है अतः कैंसर से ग्रसित रोगी मछलियों का सेवन जरूर करें।

समुंद्री सिवार - 

समुंद्री सिवार एक तरह से एक समुंद्री सब्जी है, जिसमे सभी तरह के आवश्यक पोषक तत्वों की मौजूदगी होती है। यह भी फेफड़ों के कैंसर के लिए बहुत अधिक फायदेमंद होती है। अतः समुंद्री सिवार का प्रयोग भी अपने भोजन में जरूर करें।

लहसुन और हल्दी - 

लहसुन और हल्दी का प्रयोग अक्सर संक्रमण रोधि के रूप में किया जाता है, अतः लंग कैंसर के मरीज को अपने भोजन सहित दूध में भी इसका सेवन करते रहना चाहिए। साथ ही लहसुन की कच्ची कलियों का प्रयोग खाली पेट सुबह के समय जरूर करना चाहिए, इससे कैंसर से लड़ने में काफी मदद मिलती है।

रेड वाइन - 

रेड वाइन को सुबह शाम दवा के रूप में इस्तेमाल करना भी फेफड़े के कैंसर की रोकथाम के लिए बहुत ही उपयोगी है। अतः रेड वाइन को दवा के रूप में कभी कभार जरूर इस्तेमाल करें। इसमें रेसवेराट्रॉल(resveratrol) नामक तत्व पाया जाता है जो लंग कैंसर में फायदेमंद है।

नोनी - 

नोनी एक तरह का फल होता है जो उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। कैंसर के लिए इसका प्रयोग ज्यूस बनाकर किया जाता है। नोनी का ज्यूस कैंसर कोशिकाओं से लड़ने तथा उन्हें खत्म करने के लिए बहुत ही उपयोगी है, अतः इसके ज्यूस को अपने खानपान में जरूर शामिल करें।

ग्रीन टी - 

ग्रीन टी का प्रयोग एंटीऑक्सीडेंट के रूप में किया जाता है यह हमारी सेहत के लिए काफी फायदेमंद होती है। लंग कैंसर के लिए भी ग्रीन टी लाभकारी साबित हुई है। साधारण चाय के स्थान पर ग्रीन टी का प्रयोग करें जिससे कि फेफड़े मजबूत हों और कैंसर से लड़ने में मदद मिले।

फेफड़ों के कैंसर से बचाव - 

लंग कैंसर से बचाव के लिए इसके कारणों पर रोक लगाना अति आवश्यक है अतः उन कारणों को अगर रोक रखते हो तो इससे बचाव स्वतः ही हो जाता है।
  • लंग कैंसर का सबसे बड़ा कारण धूम्रपान है अतः किसी भी प्रकार धूम्रपान ना करें। चाहे वह बीड़ी, तम्बाखू, सिगरेट कुछ भी हो, हर तरह का धूम्रपान लंग कैंसर का सबसे बड़ा कारण है।
  • प्रदूषित वातावरण से बचें, सुबह शुद्ध और ताजा जलवायु का सेवन करें। इसके लिए सुबह जल्दी उठकर सैर करें और अधिक प्रदूषण वाली जगह से दूर रहें।
  • दूसरों के द्वारा की गई स्मोकिंग (second hand smoking) से दूर रहें। परिवार में किसी को भी धूम्रपान न करने दें।
  • हमेशा शुद्ध व ताजा भोजन करें, जो पोषक तत्वों से भरपूर हो।
  • शराब (अल्कोहॉल) आदि के सेवन से बचें।
  • विटामिन सी, केरेटिनॉइड, सेलेनियम, आदि से युक्त भोजन करें।
  • हमेशा स्वच्छ रहें और स्वच्छ आहार लें।

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